ऐसे बने ‘चंद्र’ से ‘खयाल’

मशहूर शायर चंद्रभान सिंह 'खयाल' से स्वर्णा तिवारी का साक्षात्कार

—स्वर्णा तिवारी—
सोहागपुर। बात जब उर्दू और संस्कृत की हो तो आमतौर पर हमारे जेहन में वर्ग विशेष के नाम कौंधते हैं, लेकिन सचाई यह नहीं है। भाषा निरपेक्ष होती है और इसमें डूबने वाले मशहूर हो जाते हैं। माखन नगर बाबई और सोहागपुर जैसे छोटे कस्बे से ताल्लुक रखने वाले चंद्रभान सिंह ‘खयाल’ उर्दू की ऐसी ही मशहूर हस्ती हैं, जिन्हे पूरी दुनिया पढती और सुनती आ रही है। ऐसी शख्सियत से साक्षात्कार उनके तजुर्बों की किताबों के कीमती पन्नों से रू—ब—रू होने का अहसास कराता है। हाल ही में जब वे सोहागपुर आए तो उन्होने बडप्पन दिखाते हुए स्वर्णा तिवारी को ‘शुभ चौपाल’ के लिए खास साक्षात्कार दिया। यहां पढें उसके चुनिंदा अंश—

कैसे सीखी उर्दू जबान?
इस सवाल का जबाब चंद्रभान सिंह ‘खयाल’ को बचपने में ले जाता है। वे बताते हैं कि पढने— लिखने का उनका शौक जुनून की हद तक था। इसी जुनून के चलते उर्दू में पढने— लिखने की ठानी और बिना किसी गुरु के किताबों के सहारे उर्दू सीखी। फिर लगातार पढने— लिखने से पकड बनती गई। चंद्रभान सिंह ‘खयाल’ का उर्दू के अलावा हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत में भी खासा दखल है, लेकिन अपनी मातृभाषा बुंदेली भी उन्हे प्यारी है।

‘चंद्र’ से कैसे बने खयाल?
चंद्रभान सिंह ‘खयाल’ बताते हैं कि वे पहले चंद्रभान सिंह ‘चंद्र’ के नाम से लिखा करते थे। इनके प्राथमिक शाला के गुरु बृजमोहन सिंह ठाकुर ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और एक दिन दुनिया में मशहूर होने का आशीर्वाद दिया। एक बार वे अपनी ताजी नज्म दिखाने मशहूर शायर और विद्वान पंडित राम किशन मुज़तर के पास पहुंचे। उन्होंने उन्हें मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी से परिचय कराया और बताया कि यह अभी ‘चंद्र’ उपनाम से लिखते है पर मुझे जंचता नहीं। नज्म सुनने के बाद इनके खयालों से प्रभावित होकर फिराक गोरखपुरी ने इनको ‘खयाल’ तखल्लुस से नवाजा। इस तरह चंद्रभान सिंह ‘चंद्र’ से ‘खयाल’ हो गए।

कैसे आया निखार?
खयाल साहब इस सवाल के जबाब में बताते हैं कि लिखना— पढना चलता रहा और इस सफर में कई लोगों से मुलाकाते होती रहीं, तजुर्बे बढते गए। प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर जी के साथ करना एक बहुत अच्छा अनुभव रहा। कमलेश्वर जी को याद करते हुए वे कहते हैं कि उनसे पहली मुलाकात उनकी किताब ‘कितने पाकिस्तान’ के जरिए हुई थी। कमलेश्वर जी बेहतरीन व्यक्तित्व थे, जो समाज में फैले भ्रष्टाचार और अनाचार की खिलाफत करते नजर आते थे।
वे तेज मिजाज और बेखौफ लेखक थे।

यह रहा लेखन संसार
चंद्रभान सिंह खयाल कई प्रतिष्ठित उर्दू अखबारों में संपादन और लेखन करते रहे। उनकी पहली किताब ‘शोलों का शजर’ प्रकाशित हुई, जिसने उन्हे एक बेहतरीन शायर के रूप में स्थापित किया। इसके बाद ‘गुमशुदा आदमी का इंतजार’, ‘कुमार पाशी— एक इंकलाब’, ‘सुलगती सोच के साए’ और सुभ— ए— मशरिक की अजान’ ने उन्हे दुनिया के कोने— कोने तक पहुंचा दिया। ‘खयाल’ की सबसे मशहूर किताब ‘लौलक’ है। यह एक लंबी कविता है, जो पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के जीवन दर्शन पर केंद्रित है। इसका दुनिया के कई देशों और भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

मिलते रहे कद्रदां
अपनी कामयाबी के सफर के बारे में ‘खयाल’ साहब कहते हैं कि सफर चलता रहा और देश— विदेश में कई पुरस्कार— सम्मान भी मिलते रहे। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री तथा संगीत, साहित्य और कलाओं के कद्रदान अर्जुन सिंह ने देश की देश की उर्दू एकेडमी में इन्हे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। यहां ये सर्वाधिक साढे तीन साल का सार्वाजिक लंबा वक्त गुजारा। ये विश्व उर्दू सम्मेलन के सचिव भी रहे हैं तथा आज भी उर्दू के प्रचार- प्रसार और उत्थान के लिए काम कर रहे हैं। दुनिया के कई देशों में उन्होने उर्दू का परचम फहराया है।

क्या करें नवोदित?
इस सवाल पर ‘खयाल’ साहब चंद लम्हों में ही मानो अतीत की यात्रा कर गुजरते हैं। वे कहते हैं कि एक ही रास्ता है— जमकर पढें, जमकर लिखें। इससे कलम में निखार आता जाएगा और काबिलियत अपना मुकाम खुद बना लेगी।

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