चित्रकूट वाले गुरुजी का संस्कृत और संस्कृति के संरक्षण में अविस्मरणीय योगदान

जामगढ में गुरुजी की समाधि के पास श्रद्धा के साथ मनी पुण्यतिथि: शिष्यमण्डल ने रेखांकित किया गुरुजी का व्यक्त्वि और कृतित्व: गुरुजी के जामगढ आने का यह 75वां वर्ष: महामण्डलेश्वर पूज्य गिरीशदास जी महाराज पूज्य प्रमोदगिरी जी महाराज और पूज्य गोविंददास जी महाराज के साथ पधारे

—कमल याज्ञवल्क्य/मनीष शर्मा
जामगढ़ (बरेली)। नबाबी और उसके बाद के दौर में संस्कृत तथा संस्कृति इस अंचल में गंभीर संकट में थे। ऐसे कठिन समय में चित्रकूट वाले गुरुजी ने जामगढ को केंद्र बनाकर तत्कालीन भोपाल राज्य में बडी संख्या में लोगों का संस्कारित करके समाज पर अविस्मरणीय उपकार किया है।महामण्डलेश्वर पूज्य गिरीशदास जी महाराज ने ये उद्गार जामगढ में ब्रह्मलीन गुरुजी की समाधि के समीप आयोजित पुण्यतिथि के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होने कहा कि वे इस भूमि को नमन करने की इच्छा रखते थे, जहां कर्मकाण्ड भास्कर चित्रकूट वाले गुरुजी जैसी विभूति युवावस्था से अंतिम सांस तक ज्ञान, कर्म और भक्ति का आलोक लोक कल्याण के लिए बिखेरते रहे।महामण्डलेश्वर जी ने श्री ऋषीश्वर संस्कृत पाठशाला का संचालन कर रहे गुरुजी के उत्तराधिकारी आचार्य शेषनारायण पाण्डेय की भूरि—भूरि प्रशंसा की, जो पूज्य गुरुजी के ज्ञानदान की परंपरा को आकाशवृत्ति के सहारे आगे बढा रहे हैं।महामण्डलेश्वर जी के साथ पधारे पूज्य प्रमोदगिरी जी महाराज और पूज्य गोविंददास जी महाराज ने भी पूज्य गुरुजी के अवदान को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। इससे पहले सभी ने मंत्रोच्चार के बीच पूज्य गुरुजी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की।

बताया— ऐसे थे हमारे गुरुजीपूज्य चित्रकूट वाले गुरुजी की पुण्य तिथि पर आयोजित कार्यक्रम में गुरुजी के शिष्य पंडित शिवकुमार पटेल मातावारे, पंडित शिवनारायण शर्मा, पंडित नरसी प्रसाद शर्मा सहित अन्य लोगों ने अपने संस्मरण सुनाए। पंडित नरसी प्रसाद शर्मा ने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि पूज्य गुरुजी ने जीवनभर कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। प्रतिदिन कई घंटे के हवन, ​अतिथियों और श्री ऋषीश्वर संस्कृत पाठशाला के शिष्यों के लिए शुद्ध घी सहित सभी व्यवस्थाएं वे कैसे जुटाते रहे, कोई नहीं समझ सका। पंडित कमलकिशोर शर्मा ने कहा कि पूज्य गुरुजी शिव और शक्ति के अनन्य उपासक थे। पटेल शशिमोहन पटेल ने कहा कि हमारे पूर्वजों का यह पुण्य—प्रताप ही रहा कि पूज्य गुरुजी ने अपनी कर्मस्थली जामगढ को बनाया। पंडित कैलाश भारद्वाज, पंडित प्रदीप भार्गव, पंडित अमित शर्मा, पंडित सुनील भारद्वाज, पंडित माधोप्रसाद शर्मा, पंडित नीरज शर्मा और राधेश्याम सराठे आदि ने भी पूज्य गुरुजी को श्रद्धा—सुमन अर्पित किए। समापन में आचार्य शेषनारायण पाण्डेय ने महामण्डलेश्वर जी, साथ आए संतों और सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होने कहा कि पूज्य गुरुजी के बताए रास्ते पर चलते हुए वे श्री ऋषीश्वर संस्कृत पाठशाला के माध्यम से कठिन स्थितियों में भी संस्कृत शिक्षा के प्रसार का प्रयास कर रहे हैं। समाज का सहयोग इसमे महत्वपूर्ण है। इससे पहले पूज्य गुरुजी की पुण्य तिथि पर भण्डारा भी चलता रहा।

कौन थे पूज्य चित्रकूट वाले गुरुजी?मूर्धन्य संत और कर्म, भक्ति तथा ज्ञान की त्रिवेणी कर्मकाण्ड भास्कर चित्रकूट वाले गुरुजी पंडित रामचंद्र जी त्रिपाठी का जन्म उत्तरप्रदेश के बांदा जिले के कर्वी के ग्राम पहाडी में एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। अपने ज्येष्ठ भ्राता व्याकरणाचार्य पंडित शिवदर्शन जी त्रिपाठी से प्रारंभिक संस्कृत ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनकी ज्ञान के प्रति उत्कट अभिलाषा उन्हे वाराणसी और काशी के प्रकाण्ड विद्वान गुरु श्री महाशय जी के पास ले गई। इनके सानिध्य में अध्ययन के बाद वे जयपुर पहुंचे और यहां महाराज सवाई मानसिंह के राजवैद्य आयुर्वेदाचार्य भट्ट जी के पास रहकर आयुर्वेद का अध्ययन करते रहे। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक दौर था और वे भी इसमें सहभागी बने। सन् 1948 में ब्रह्मलीन पूज्य गुरुजी वापोली वालों ने वापोली में सारासार संस्कृत पाठशाला प्रारंभ की तो सुयोग्य आचार्य के रूप में पूज्य चित्रकूट वाले गुरुजी यहां आ गए। गृहक्षेत्र लौटने का मन बना चुके गुरुजी मई 1949 में जामगढ आए और यहां के लोगों के प्रेम तथा आग्रह के वशीभूत होकर हमेशा के लिए जामगढ के हो गए।
कृपया यह भी देखें—

गुरुजी पुण्य स्मरण— सनातन संस्कृति साकार थी गुरुजी चित्रकूट में

Get real time updates directly on you device, subscribe now.