विनम्र स्मरण: डॉ वैदिक जी हिंदी के सेवी थे, अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन भी किए

डॉ वेदप्रताप वैदिक पत्रकारिता जगत का विख्यात नाम रहा है। पत्रकारिता को 'ख़बरपालिका' कहने वाले हमारे मध्यप्रदेश के वैदिक जी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) की हिंदी सेवा 'भाषा' के संस्थापक संपादक रहे और विभिन्न संस्थानों में महत्वपूर्ण दायित्व निभाने के बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में निरंतर लेखन कर रहे थे। उनकी स्मृतियों के साथ यह विनम्र श्रद्धांजलि!

—अशोक मनवानी
मध्यप्रदेश के जिन पत्रकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया, उनमें डॉ वेदप्रताप वैदिक भी शामिल हैं। वैदिक जी के निधन की सूचना ने कुछ पुरानी स्मृतियों को सामने ला दिया और उनसे जुडे प्रसंग आंखों में कौंध उठे। डॉ वैदिक की पहचान एक हिंदी सेवी पत्रकार की रही। विदेश नीति और भारत के अन्य देशों से तालुकात पर उन्होंने सालों साल लिखा है। लेकिन सच यह भी है कि राज्यसभा सदस्य होने की उनकी हसरत पूरी न हो सकी।

वैदिक जी साल 1986 में बंगलौर कर्नाटक से प्रारंभ हिंदी दैनिक आदर्श पत्र में सलाहकार संपादक बनाए गए। किन्हीं कारणों से उनका आना हुआ ही नहीं। मैंने अपने कुछ मित्रों सहित लगभग 6 मास दक्षिण भारत में रहकर हिंदी की पताका लहराने के उपक्रम को सहयोग दिया। सतीश जोशी, मुकेश कुमार, अन्नू आनंद, ओम प्रकाश गुप्ता चाणक्य, शशिधर खां हमारे सहयोगी और अखबार के वरिष्ठ कर्ताधर्ता बने। हमने बहुत उत्साह से आदर्श पत्र में कार्य किया। कभी-कभी दूरभाष पर वैदिक साहब से चर्चा होती थी।अखबार को लेकर वे राय देते। अखबार में संपादकीय लेखन भी हम लोग बारी-बारी से किया करते थे। अगर विदेश नीति और भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर कोई आलेख छपता या हम अग्रलेख लिखते तो वैदिक जी अनिवार्य रूप से उसका जिक्र करते थे।

कई बरस बाद जब वे एक कार्यक्रम में भोपाल में आए थे तो मैंने पूछ लिया था, क्यों नहीं आए थे सर आप, आप आते तो अखबार अब तक चल रहा होता। तब उन्होंने कहा सच बताऊं मैं चावल नहीं खा सकता और बैंगलोर में तो जगह-जगह रोटी का टोटा है। बहुत सरल ढंग से, जैसे बाल मन से उन्होंने यह बात कह दी थी। इतनी सहजता सरलता दिल्ली में जम चुके लोगों में नहीं देखी जाती आमतौर पर।

इंदौर में वर्ष 1990 में अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन में वैदिक जी तत्कालीन मुख्यमंत्री पटवा जी के साथ मुख्य वक्ता थे। उस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह जी भी आए थे। तब मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग ने हिंदी के प्रचार पर एक पुस्तिका प्रकाशित की थी, जो वैदिक जी को बहुत पसंद आई थी।

उनके आलेखों पर पाठकों की प्रतिक्रिया मिले तो वे प्रसन्न होते थे और यदि यह प्रतिक्रिया लेखकों पत्रकारों से मिल जाए तो उनकी अत्यधिक खुशी देखी जा सकती थी।

सागर विश्वविद्यालय में हमारे पत्रकारिता गुरु स्व भुवन भूषण देवलिया जी ने उन्हें साल 1987 में पत्रकारिता विभाग में आमंत्रित किया था। उस भेंट में उनसे बहुत बातें हुई। आंचलिक पत्रकारिता और राष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता पर उनके विचार जानने को मिले। दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता पर मैंने अपने 6 माह के कार्य अनुभव को पत्रकारिता के विद्यार्थियों से साझा किया था। श्री भुवन भूषण देवलिया जी ने इतने बड़े व्यक्तित्व के साथ मुझे आमंत्रित किया था। प्रो प्रदीप कृष्णात्रे जी भी मौके पर उपस्थित थे। भाई राजेश सिरोठिया को भी इस मौके पर आना था,लेकिन वे भास्कर, भोपाल की जिम्मेदारियों के चलते सागर नहीं आ सके थे।

इंदौर के भंवर कुआ (अब टंट्या मामा चौराहे) से कुछ दूरी पर एक बंगले के बाहर उनके नाम की तख्ती (वैदिक सदन) बरसों से लगी रही। इंदौर जाने पर यह मैं देखा करता था अक्सर। लेकिन वे सिर्फ एक बार इंदौर में मिले। इसके पहले सागर विश्वविद्यालय में व्याख्यान के लिए पधारे थे। भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन 2015 में वे नहीं आ सके थे जिसका उन्हें बहुत मलाल था। हालांकि उन्होंने अपने प्रकाशन यहां भेजे थे। भोपाल में श्री सनत जैन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में वैदिक जी से कुछ वर्ष पहले भेंट हुई तो बहुत प्रसन्न हो गए। बोले बैंगलोर की टीम में से आप और मुकेश कुमार ही मिलते हैं बस।

उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को मध्यप्रदेश के उनके अनुवर्ती साथी हमेशा याद रखेंगे। आदरांजलि! सागर विश्वविद्यालय परिवार, हमारे बैच 1984—85 की ओर से पत्रकारिता के अपने अग्रज को विनम्र श्रद्धांजलि!

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