संविधान की तिहत्तर वर्षों की विकास यात्रा

(संविधान दिवस/26 नवंबर पर विशेष)

—डॉ हरबंश दीक्षित
तिहत्तर वर्ष पहले 26 नवंबर, 1949 को हमने अपने संविधान को अधिनियमित तथा अंगीकृत किया था । तब से हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया है। किसी राष्ट्र के जीवनकाल में यह बहुत बड़ा कालखंड नहीं माना जाता, किन्तु इन वर्षों में उस राष्ट्र के भविष्य की पीठिका तैयार हो जाती है। संविधिक विकास के लिहाज से शुरुआती कुछ दशक अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनमें कानूनी व्यवस्था का नया ढांचा तैयार होता है। उसे आत्मसात करने की परम्परा विकसित की जाती है तथा कानून की न्यायिक व्याख्या की दिशा तय होती है। संविधान के माध्यम से हमने अपने राष्ट्र को प्रभुतासम्पन्न, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया तथा समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय देने का संकल्प लिया । हमने ऐसे समाज की परिकल्पना की, जिसमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता के साथ ही सभी नागरिकों के लिए प्रतिष्ठा और अवसर की समानता हो। संविधान आजादी और खुशहाली के वादे का दस्तावेज होता है।

संविधान हमें सपने देखने और उसके मुताबिक समाज निर्माण करने की आजादी और जज्बे को भी निरूपित करता है। उसमें केवल काले सफेद अक्षरों की भरमार नहीं होती, बल्कि वह सुशासन के लिए लिपिबद्ध भावपुंज भी होता है। लेकिन उसे मजबूती देने के दायित्व का निर्वहन उसके नागरिकों को करना होता है। हमारे संविधान के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने रामराज्य का सपना देखा था, जिसमें सभी समान हों। सभी लोग कानून की मर्यादा में रहें। राज्य सत्ता को राम की खड़ाऊं मानकर अपने आपको उसका सेवक मानकर जनता की सेवा करें। कानून का पालन निष्पक्षतापूर्वक हो। निर्णय लेते समय किसी का भय न हो तथा किसी वस्तु का लालच उन्हें स्खलित न कर सके। बीते सालों में हमने संविधान के तमाम आदर्शों के पालन का प्रयास किया है। अधिकतर मामलों में हमारा शानदार रिकार्ड रहा है।

हमारे साथ आजाद हुए करीब 50 देशों में से कहीं भी लोकशाही वहां के जनजीवन में वह पैठ नहीं बना पाई है, जो हमारे देश में बनी है। हमारे पड़ोसियों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे किसी भी देश में लोकतंत्र कभी भी खुली हवा में सांस नहीं ले पाया। वह हर समय सैनिक तानाशाही की संगीनों से भयभीत रहा। इस बीच हमने सत्रह बार आम चुनावों के माध्यम से केंद्र की सत्ता के शालीन हस्तान्तरण के गौरवपूर्ण क्षणों के साक्षी रहे हैं। आम आदमी का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। भारतीयों ने पूरे विश्व में अपनी क्षमता की छाप छोड़ी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम सम्मान से देखे जाते हैं। बावजूद इसके कुछ ऐसे क्षण आए हैं, जब हमने संविधान की मर्यादा से छेड़छाड़ की है, उसे चोट पहुंचाई है और उसकी अवमानना की है। हमारे इस आचरण ने संविधान की प्रतिष्ठा और हमारे लोकतंत्र को चोट पहुंचाई है। हमें उन पर ध्यान देने की जरूरत है। उन दोषों के परिकरण की आवश्यकता है।

हमारा संविधान सामाजिक और आर्थिक न्याय का जीवंत दस्तावेज है। आजादी के बाद के वर्षों में किए गए प्रयास इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। जमींदारी उन्मूलन जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां राष्ट्र के खाते में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हैं। विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब कुछ हजार जमींदारों से जमीन लेकर लाखों भूमिहीन किसानों को दे दी गई और यह सब कुछ बगैर किसी का खून बहाए हुए शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ। दुनिया में कोई ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं है, जहां इतने व्यापक भूमि सुधार इतनी शान्तिपूर्वक सम्पन्न हुए हों। कम्युनिस्ट देश अपने लाखों नागरिकों का खून बहाकर भी भूमिसुधारों के क्षेत्र में जो कुछ हासिल करने में सफल नहीं हो पाए, उसे हमने शान्तिपूर्वक लागू कर दिया। इसका लाभ आज पूरे देश को मिल रहा है। शिक्षा सामाजिक उन्मेष की आधारशिला है। यह ज्ञान की नई दुनिया का प्रवेश द्वार खोलती है। स्वतंत्र विचारधारा विकसित करने में मदद करती है। भ्रांतियों के अंधकार से बाहर निकालती है। आत्मविश्वास और स्वाभिमान में वृद्धि करती है। इसे संविधान के अनुच्छेद 21क के रूप मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है। राज्यों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे हैं ताकि कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहे। उसे आगे बढ़ने में कोई बाधा न रहे। यह बहुत बड़ा कदम है।

संविधान का अनुच्छेद 370 और अदृश्य अनुच्छेद 35ए हमारे मर्मस्थल पर चुभे हुए कांटे जैसा था। तीन वर्ष पहले इस दिशा में की गयी सार्थक पहल ने समता और स्वतंत्रता और स्वाभिमान को व्यापकता दी। जम्मू-कश्मीर के अलगाववाद से निपटने में आने वाली सबसे बड़ी बाधा दूर हुई। एक राष्ट्र, एक विधान और एक निशान का संकल्प पूरा हुआ। अब वहां जाने के लिए किसी परमिट की जरूरत नहीं है। देश के दूसरे हिस्से की तरह अब वहां पर शेष भारत का कोई भी व्यक्ति बस सकता है और संपत्ति खरीद सकता है। महिलाओं को बराबरी का हक हासिल हुआ और वंचित-शोषित लोगों को आरक्षण का अधिकार मिला। अनुच्छेद 370 और 35ए हमारी राजनीतिक पराजय का प्रतीक था। देश ने उसे संविधान से हटाकर अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है।

डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में कहा था कि किसी भी देश के संविधान की सफलता उस देश के नागरिकों तथा संविधान को चलाने वालों के चरित्र और उनकी नियत पर निर्भर करती है। उन्होंने आगे कहा कि चाहे जितना अच्छा संविधान क्यों न हो, यदि उसके चलाने वालों में संविधान के मूल्यों के प्रति समर्पण और उसे लागू करने का जज्बा नहीं है तो संविधान निर्जीव अक्षरों के समूह मात्र बना रहेगा। इसके उलट यदि किसी संविधान में कोई कमी रह गई हो किन्तु उसका पालन करने वाले लोग यदि संविधान के उद्देश्यों के प्रति निष्ठावान हैं तो उन कमियों को दूर करके जीवंत समाज का निर्माण करेंगे। पिछले अब तक के हमारे अनुभव ने डाॅ. अम्बेडकर के कथन को अक्षरशः सही होते हुए देखा है। संविधान के उच्च आदर्शों के प्रति हमारी निष्ठा ने बीते वर्षों में हमें अग्रिम पंक्ति तक पहुंचा दिया है। हम केवल वहीं विफल हुए हैं, जहाॅं हमारे नागरिकों और शासक वर्ग ने संविधान के मूल्यों की अनदेखी की है।
(लेखक, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी,मुरादाबाद में विधि संकाय में प्रोफेसर एवं डीन हैं। )

Get real time updates directly on you device, subscribe now.