पुस्तक समीक्षा: बवाली कनपुरिया खलनायक के सीने में नायक बनने की टीस

—मुकुंद
‘बवाली कनपुरिया’ किताब उत्तर प्रदेश के दुर्दांत विकास दुबे के जीवन की रक्तकथा है। बेहद संजीदा वरिष्ठ पत्रकार और प्रतिष्ठित कहानीकार डॉ. संजीव मिश्र ने अपने ठेठ अंदाज में विकास दुबे के उत्थान और पतन को आपराधिक, राजनीतिक और सामाजिक कसौटी के आईने में दिखाने की कोशिश की है। विकास दुबे की खूनी डगर 182 पेज पर ‘बंद गली के आखिरी मकान’ की तरह खत्म होती है। यह डगर यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि अपराधी और नेता के हाथ मिल जाएं तो असंभव को भी संभव किया जा सकता है। ‘बंद गली के आखिरी मकान’ में फंसने का हश्र क्या होता है, यह ‘बवाली कनपुरिया’ में समझाने का सामर्थ्य है।

लेखक ने ‘बवाली कनपुरिया’ अपने पिता को समर्पित कर उनके न रहने के एहसास की कीमत को आंसुओं के सहारे समझने का प्रयास कर सबसे अच्छी श्रद्धांजलि दी है। ‘बवाली कनपुरिया’ में 12 अध्याय हैं-बचपन का विकास, गांव में आई बारात, सेना छोड़ बनाई बुलेट सेना, डॉन की बहन से इश्क, विधायक बनने का सपना, खादी-खाकी और अपराध का संगम, हर जमीन हमारी है…, थाने के भीतर मंत्री की हत्या, वफा रास न आई, रंगबाजी से रंगदारी, पंद्रह मिनट, आठ शहीद, सात घायल और एनकाउंटर में मारा गया रंगबाज।

विकास का एनकाउंटर संभवतः भारत के लोगों को कभी नहीं भूल सकता। वह 10 जुलाई, 2020 की सुबह थी। सारे न्यूज चैनल चीख पड़े विकास दुबे की मौत। 1968 में कानपुर नगर सीमा के आखिरी गांव बिकरू में रामकुमार दुबे के घर जन्मा विकास बचपन से ही बिगड़ैल था। स्कूली पढ़ाई के दौरान जवानी चढ़ते ही वह रंगदारी वसूलने वालों का दादा बन बैठा। इस ‘बवाली कनपुरिया’ के खिलाफ 1985 में पहला अपराध शिवली थाने में पूरी की पूरी बारात को लूटने का दर्ज है। उस वक्त सिर पर ‘खादी’ का हाथ रखने से वह बच गया और पुलिस उसका बाल-बांका तक नहीं बिगाड़ सकी, लेकिन इसके बाद वह अपराध के दलदल में धंसता चला गया। आजिज आकर परिवार ने उसे कन्नौज ननिहाल भेज दिया। उसकी ननिहाल पहले से ही वर्चस्व की लड़ाई में उलझी थी। गुंडा भांजा के घर आने से मामा आदि के हौसले बुलंद हुए। कहते हैं कि एक रोज ननिहाल की लड़ाई में विकास ने एक बुजुर्ग की हत्या कर दी। मगर वह इस हत्याकांड में साफ बच गया। इसके बाद तो वह कानपुर से लेकर कन्नौज तक दहशत का पर्याय बन गया। थानों में उसके खिलाफ शिकायतें पहुंचने लगीं। इसी दौरान उसने इंटरमीडिएट किया।

इसके बाद कानपुर के पीपीएन कालेज में दाखिला लेकर वह पढ़ा-लिखा गुंडा बन गया। कुछ वक्त बाद अचानक उसे ऐसे जीवन से ऊब होने लगी। उसने सेना में जाने का फैसला किया। खूब पसीना बहाया। जमकर तैयारी की। एयर फोर्स और नेवी में भर्ती होने के लिए परीक्षा दी। वह पास भी हो गया। दोनों जगह से नियुक्ति और प्रशिक्षण के पत्र भी आए। वह खुश हुआ। मगर पुलिस के रोजनामचों में दर्ज मुकदमों ने उसका सेना में भर्ती होने का सपना चकनाचूर कर दिया। इसके बाद तो हर वक्त उसकी आंखों से शोले बरसने लगे। लाठी-गोली उसके साथी बन गए। बाद के वर्षों में उसने थाने के भीतर मंत्री की हत्या कर पूरे देश को चौंका दिया। कहानी यहीं नहीं खत्म होती। वह सफेदपोश भी बना। अपनी ‘कचहरी’ लगाने लगा। जनता भी पुलिस के पास जाने के बजाय उसके दर पर इंसाफ के लिए पहुंचने लगी।

खून के समंदर में जोर-जुल्म की ताकत के साथ लहरों से टकराता विकास पुलिस को गाजर-मूली समझने लगा। इलाके में उसकी तूती बोलने लगी। इस दौरान यूपी में राजनीतिक समीकरण बदले। 2020 आते-आते पुलिस पर उसे पकड़ने का दबाव बढ़ने लगा। 02 जुलाई की रात बिकरू में विकास दुबे के किलेनुमा घर पर कई थानों की पुलिस ने एक साथ चढ़ाई कर दी। खाकी में छिपे अपने मुखबिरों की वजह से विकास इससे बाखबर भी था और मुकाबले के लिए गोला-बारूद भी जुटा चुका था। उसने और उसके साथियों ने पुलिस की हर गोली का जवाब दिया। 15 मिनट में बिकरू में खून का दरिया बहाकर वह रफूचक्कर हो गया। आठ पुलिसकर्मियों की शहादत से लखनऊ की चूलें हिल गईं। सारे चैनल चीखने लगे। अखबार उसका गड़ा इतिहास उखाड़ने लगे। उत्तर प्रदेश की पूरी पुलिस उसके पीछे लग गई। फिर भी उसे उत्तर प्रदेश पुलिस नहीं पकड़ पाई।

चैनलों की मनगढ़ंत ब्रेकिंग के बीच 09 जुलाई को विकास महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंच गया। उज्जैन यात्रा उसके लिए काल बन गई। वहां से यूपी पुलिस उसे शाम को लेकर कानपुर के लिए रवाना हुई। चैनलों की ओबी वैन और गाड़ियां पुलिस काफिले के पीछे-पीछे चलीं। 10 जुलाई की सुबह कानपुर में क्या हुआ, यह आप ऊपर पढ़ चुके हैं। ‘बवाली कनपुरिया’ सिर्फ विकास दुबे का रक्त चरित्र है। ऐसा नहीं है। हर ‘बवाली कनपुरिया’ का कोई न कोई गॉड फादर होता है। यह हर अपराधी के मारे जाने के बाद हर दफा साबित हुआ है। यही ‘बवाली कनपुरिया’ का निचोड़ है। अगर आपको अपराध कथाएं पढ़ने में दिलचस्पी है, तो संजीव मिश्र का ‘बवाली कनपुरिया’ आपको पसंद आएगा।

लेखक-डॉ. संजीव मिश्र
किताब का नाम-बवाली कनपुरिया
प्रकाशक-हिंद पॉकेट बुक्स पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट

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